नई दिल्ली. पैकेज्ड खाद्य पदार्थ खरीदते समय उपभोक्ताओं का ध्यान आमतौर पर कीमत, स्वाद और ब्रांड पर अधिक रहता है, जबकि उनमें मौजूद चीनी, नमक और संतृप्त वसा की वास्तविक मात्रा को समझना कई बार आसान नहीं होता। इसी चुनौती को देखते हुए खाद्य नियामक भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण ने पैकेट पर स्पष्ट चेतावनी देने की दिशा में कदम बढ़ाया है। प्रस्तावित व्यवस्था का उद्देश्य उपभोक्ताओं को खरीदारी के समय ही यह संकेत देना है कि किसी खाद्य पदार्थ में स्वास्थ्य के लिए चिंता पैदा करने वाले पोषक तत्व निर्धारित सीमा से अधिक तो नहीं हैं। इस बदलाव का सीधा असर रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाले बिस्किट, नमकीन और अन्य पैकेज्ड उत्पादों पर पड़ सकता है।
FSSAI ने प्रस्तावित किया था लाल चेतावनी लेबल
FSSAI ने पिछले महीने पैकेज्ड खाद्य पदार्थों के लिए लाल रंग के छह-कोणीय चेतावनी लेबल का प्रस्ताव रखा था। इसके तहत यदि किसी उत्पाद में निर्धारित सीमा से अधिक अतिरिक्त चीनी, नमक या संतृप्त वसा में से कम से कम 2 तत्व मौजूद होते हैं, तो पैकेट पर स्पष्ट चेतावनी दिखाई जानी थी। इस व्यवस्था का मकसद जटिल पोषण तालिकाओं को पढ़े बिना उपभोक्ताओं को उत्पाद की प्रमुख स्वास्थ्य संबंधी विशेषताओं का तत्काल संकेत देना है। नियामक ने इसके लिए चरणबद्ध तरीके से नियम लागू करने का प्रस्ताव रखा था, ताकि खाद्य उद्योग को नए मानकों के अनुरूप ढलने का समय मिल सके। हालांकि, इसी दो-चरणीय व्यवस्था को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं।
अदालत ने पूछा, सख्त नियम के लिए इंतजार क्यों
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान अदालत ने इस बात पर चिंता जताई कि यदि अधिक प्रभावी चेतावनी व्यवस्था बाद के चरण में लागू की जाती है, तो उपभोक्ताओं को महत्वपूर्ण स्वास्थ्य जानकारी मिलने में अनावश्यक देरी हो सकती है। अदालत की चिंता का केंद्र केवल लेबल की डिजाइन या रंग व्यवस्था नहीं, बल्कि यह सवाल है कि उपभोक्ता को सही जानकारी कितनी जल्दी और कितनी स्पष्टता से उपलब्ध कराई जाए। सुनवाई के दौरान FSSAI ने अपने रुख में नरमी दिखाते हुए संकेत दिया कि वह शुरुआत से ही अधिक सख्त चेतावनी व्यवस्था पर विचार करने को तैयार है। इसका अर्थ यह हो सकता है कि प्रस्तावित व्यवस्था को लागू करने से पहले लंबा संक्रमणकाल रखने के बजाय अपेक्षाकृत कड़े मानकों को शुरुआत से ही अपनाया जाए।
सिर्फ एक पोषक तत्व अधिक होने पर भी मिल सकता है संकेत
मौजूदा चर्चा का एक महत्वपूर्ण पहलू चेतावनी जारी करने की सीमा से जुड़ा है। यदि FSSAI अधिक सख्त व्यवस्था को स्वीकार करता है, तो संभव है कि किसी उत्पाद में निर्धारित सीमा से केवल एक प्रमुख तत्व अधिक होने पर भी चेतावनी लेबल लगाना पड़े। उदाहरण के लिए, यदि किसी पैकेज्ड खाद्य पदार्थ में चीनी या नमक निर्धारित सीमा से अधिक है, तो उपभोक्ता को पैकेट के सामने ही इसका स्पष्ट संकेत मिल सकता है। इससे खरीदारी के समय निर्णय लेना आसान हो सकता है और पोषण संबंधी जानकारी अधिक प्रत्यक्ष रूप में सामने आएगी। हालांकि, अंतिम व्यवस्था और उसके तकनीकी मानदंड नियामक स्तर पर तय होने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि चेतावनी किन उत्पादों और किन परिस्थितियों में अनिवार्य होगी।
बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर सुप्रीम कोर्ट गंभीर
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने खास तौर पर बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर चिंता व्यक्त की। अदालत का मानना है कि बढ़ती उम्र में बच्चों के खान-पान की आदतों और उनके स्वास्थ्य पर पैकेज्ड खाद्य पदार्थों की संरचना का प्रभाव एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्वास्थ्य विषय है। ऐसे में उपभोक्ताओं को खाद्य पदार्थों में मौजूद अधिक चीनी, नमक और संतृप्त वसा के बारे में सरल एवं आसानी से समझ आने वाली जानकारी मिलना महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने इस मुद्दे को व्यापक जनहित और देश के स्वास्थ्य से जुड़ा विषय माना है। इससे संकेत मिलता है कि आने वाले समय में खाद्य लेबलिंग को केवल उपभोक्ता सूचना का विषय न मानकर सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति के व्यापक संदर्भ में भी देखा जा सकता है।
अब 28 सितंबर की सुनवाई पर टिकी नजर
सुप्रीम कोर्ट ने मामले से जुड़े सभी पक्षों को आगे जारी होने वाले आदेश का अध्ययन करने और अपनी राय रखने को कहा है। अब अगली सुनवाई 28 सितंबर को प्रस्तावित है, जहां चेतावनी लेबल से जुड़ी व्यवस्था पर आगे की दिशा अधिक स्पष्ट हो सकती है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि FSSAI शुरुआत से ही अधिक सख्त चेतावनी व्यवस्था लागू करने की दिशा में आगे बढ़ेगा या पहले प्रस्तावित 2 चरणों वाले मॉडल को ही जारी रखा जाएगा। अंतिम निर्णय का असर खाद्य निर्माताओं की पैकेजिंग, उत्पाद सूचना और उपभोक्ताओं के खरीदारी संबंधी निर्णयों पर पड़ सकता है। ऐसे में इस मामले पर खाद्य उद्योग के साथ-साथ आम उपभोक्ताओं की भी नजर बनी हुई है।