पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव अब केवल होर्मुज जलडमरूमध्य तक सीमित नहीं रहा है। लाल सागर में लगातार बढ़ती सैन्य गतिविधियों और समुद्री हमलों ने वैश्विक व्यापार तथा ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों द्वारा सऊदी अरब के ऊर्जा प्रतिष्ठानों और समुद्री मार्गों को निशाना बनाए जाने के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल आपूर्ति की स्थिरता को लेकर चिंता बढ़ गई है। ऐसे समय में भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देश की रणनीति और तेल आपूर्ति व्यवस्था पर भी वैश्विक निगाहें टिक गई हैं। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल भारत को तत्काल आपूर्ति संकट का सामना करने की संभावना सीमित दिखाई देती है, लेकिन हालात लंबे समय तक बिगड़े तो असर से पूरी तरह बचना आसान नहीं होगा।
लाल सागर क्यों है वैश्विक ऊर्जा व्यापार की जीवनरेखा?
लाल सागर और स्वेज नहर विश्व के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में गिने जाते हैं। एशिया, यूरोप और अफ्रीका के बीच होने वाले बड़े हिस्से का व्यापार इसी मार्ग से होकर गुजरता है। प्रतिदिन लाखों बैरल कच्चा तेल और बड़ी मात्रा में अन्य ऊर्जा उत्पाद इसी समुद्री गलियारे के माध्यम से विभिन्न देशों तक पहुंचते हैं। यदि इस क्षेत्र में सैन्य तनाव बढ़ता है या जहाजों की आवाजाही प्रभावित होती है, तो इसका सीधा असर वैश्विक आपूर्ति, परिवहन लागत और अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ता है। यही कारण है कि लाल सागर में प्रत्येक सुरक्षा चुनौती पूरी दुनिया की ऊर्जा अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है।
भारत की ऊर्जा जरूरतों में रूस की बढ़ती भूमिका
भारत अपनी कुल कच्चे तेल की आवश्यकता का लगभग 85 प्रतिशत आयात के माध्यम से पूरा करता है। पिछले कुछ वर्षों में रूस भारत का प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ता बनकर उभरा है। रियायती दरों पर उपलब्ध रूसी कच्चे तेल ने भारतीय रिफाइनरियों को लागत नियंत्रित रखने में महत्वपूर्ण सहायता दी है। उपलब्ध व्यापारिक आंकड़ों के अनुसार मार्च से मई के बीच भारत ने रूस से लगभग 17.13 अरब डॉलर मूल्य का कच्चा तेल खरीदा, जो पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में लगभग 30 प्रतिशत अधिक रहा। दोनों देशों के बीच स्थानीय मुद्रा में बढ़ते व्यापार ने भी ऊर्जा सहयोग को नई मजबूती प्रदान की है।
रूसी तेल टैंकरों पर फिलहाल कम क्यों माना जा रहा है खतरा?
विशेषज्ञों का आकलन है कि रूस से जुड़े अधिकांश तेल टैंकर फिलहाल अपेक्षाकृत सुरक्षित स्थिति में हैं। वर्ष 2024 में इजरायल-हमास संघर्ष के दौरान हूती विद्रोहियों ने सार्वजनिक रूप से संकेत दिया था कि उनका मुख्य निशाना अमेरिका, ब्रिटेन और इजरायल से जुड़े जहाज होंगे, जबकि रूस और चीन से जुड़े जहाजों को लक्ष्य नहीं बनाया जाएगा। ईरान और रूस के बीच रणनीतिक संबंधों को देखते हुए फिलहाल यही धारणा बनी हुई है कि रूसी तेल ले जाने वाले जहाजों पर जोखिम अपेक्षाकृत कम है। हालांकि सुरक्षा विशेषज्ञ यह भी चेतावनी देते हैं कि किसी भी सैन्य संघर्ष में परिस्थितियां तेजी से बदल सकती हैं और जोखिम का पूरी तरह समाप्त होना संभव नहीं माना जा सकता।
'शैडो फ्लीट' बनी नई रणनीतिक चुनौती
रूस अपने निर्यात का एक बड़ा हिस्सा तथाकथित 'शैडो फ्लीट' के माध्यम से संचालित करता है। इन जहाजों की स्वामित्व संरचना, बीमा व्यवस्था और परिचालन कई देशों के माध्यम से संचालित होता है, जिससे उनकी वास्तविक पहचान कई बार स्पष्ट नहीं रहती। यदि किसी जहाज की पहचान विवादित या अस्पष्ट होती है, तो उसके लिए सुरक्षा जोखिम बढ़ सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि समुद्री निगरानी और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के बीच ऐसे जहाजों की गतिविधियों पर लगातार नजर रखी जा रही है। इसलिए भारत के लिए केवल तेल उपलब्ध होना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि सुरक्षित और निर्बाध परिवहन भी समान रूप से महत्वपूर्ण है।
तेल कीमतों और शिपिंग लागत पर पड़ सकता है अप्रत्यक्ष असर
भले ही भारत की तेल आपूर्ति तत्काल प्रभावित न हो, लेकिन यदि लाल सागर में संघर्ष लंबा चलता है तो समुद्री परिवहन की लागत बढ़ सकती है। जहाजों का बीमा प्रीमियम महंगा होने, वैकल्पिक मार्ग अपनाने और यात्रा अवधि बढ़ने से तेल आयात की कुल लागत में वृद्धि संभव है। इसका प्रभाव अंततः घरेलू ईंधन कीमतों, औद्योगिक लागत और महंगाई पर भी पड़ सकता है। वैश्विक ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता बढ़ने पर अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आने की आशंका भी बनी रहती है, जिसका असर भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर अपेक्षाकृत अधिक होता है।
ऊर्जा सुरक्षा के लिए भारत की दीर्घकालिक रणनीति
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान परिस्थितियां भारत के लिए ऊर्जा स्रोतों के विविधीकरण की आवश्यकता को और अधिक महत्वपूर्ण बनाती हैं। भारत पहले से ही रूस के अलावा पश्चिम एशिया, अमेरिका, अफ्रीका और अन्य देशों से भी कच्चे तेल की खरीद कर रहा है। इसके साथ-साथ रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार का विस्तार, समुद्री आपूर्ति मार्गों की सुरक्षा, नवीकरणीय ऊर्जा का विकास और घरेलू ऊर्जा उत्पादन बढ़ाना भी दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा के महत्वपूर्ण स्तंभ माने जा रहे हैं। बदलते वैश्विक भू-राजनीतिक परिदृश्य में संतुलित ऊर्जा नीति ही भारत को संभावित आपूर्ति संकटों से सुरक्षित रखने में निर्णायक भूमिका निभा सकती है।