मुम्बई. भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के बदलते परिदृश्य को लेकर पूर्व थलसेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे का आकलन रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उनका कहना है कि पाकिस्तान की ओर से आतंकवाद और सीमा पार अस्थिरता की चुनौती के कारण भारत का तत्काल सुरक्षा ध्यान पश्चिमी मोर्चे पर बना रहता है। हालांकि दीर्घकालिक परिप्रेक्ष्य में चीन कहीं अधिक व्यापक और बहुआयामी चुनौती पेश कर सकता है। नरवणे ने चीन के लिए सीधे ‘दुश्मन’ शब्द का इस्तेमाल करने से बचते हुए यह संकेत दिया कि भारत को प्रतिस्पर्धा, संवाद और सुरक्षा तैयारियों के बीच संतुलन बनाकर चलना होगा। चीन के साथ सीमा विवाद और 2020 के पूर्वी लद्दाख संकट के दौरान उनकी भूमिका इस आकलन को और महत्वपूर्ण बनाती है।
दोनों देशों से सीमा विवाद, लेकिन चुनौती का स्वरूप अलग
नरवणे के आकलन में पाकिस्तान और चीन दोनों भारत के लिए सुरक्षा चुनौतियां हैं, लेकिन दोनों की प्रकृति एक जैसी नहीं है। पाकिस्तान के मामले में आतंकवाद और उसके समर्थन से जुड़ी समस्या भारत के लिए तत्काल सुरक्षा चिंता बनी रहती है, जबकि चीन के साथ चुनौती कहीं अधिक व्यापक है। चीन के साथ भारत का विवाद केवल सीमा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके साथ आर्थिक शक्ति, व्यापार, प्रौद्योगिकी, सैन्य क्षमता और क्षेत्रीय प्रभाव जैसे पहलू भी जुड़े हुए हैं। पूर्व सेना प्रमुख का संकेत है कि प्रतिस्पर्धा जितनी व्यापक होगी, रणनीतिक टकराव की संभावनाएं भी उतनी ही जटिल हो सकती हैं। इसलिए भारत को केवल तत्काल संकटों पर प्रतिक्रिया देने के बजाय लंबी अवधि की राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति तैयार रखनी होगी।
चीन के साथ प्रतिस्पर्धा बहुआयामी होगी
चीन को लेकर नरवणे की चिंता का केंद्र केवल सैन्य शक्ति नहीं है। उनका आकलन व्यापक राष्ट्रीय शक्ति के संदर्भ में है, जिसमें राजनीति, अर्थव्यवस्था, व्यापार और सैन्य क्षमता एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। चीन के साथ भारत की प्रतिस्पर्धा आने वाले वर्षों में हिंद-प्रशांत क्षेत्र, आपूर्ति श्रृंखलाओं, प्रौद्योगिकी, बुनियादी ढांचे और रणनीतिक प्रभाव तक फैल सकती है। 2020 के पूर्वी लद्दाख संकट ने भी यह दिखाया था कि सीमा पर तनाव किस तरह अचानक बड़े सैन्य टकराव की स्थिति पैदा कर सकता है। नरवणे स्वयं उस दौर में थलसेना प्रमुख थे और उनके कार्यकाल के दौरान भारत-चीन सीमा पर सैन्य तैनाती और रणनीतिक तैयारियां एक बड़े बदलाव से गुजरी थीं।
बातचीत का रास्ता बंद नहीं होना चाहिए
नरवणे की रणनीतिक सोच का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष संवाद और कूटनीति को लेकर है। उनका मानना है कि भारत को सैन्य शक्ति को मजबूत रखने के साथ मतभेदों को बातचीत और कूटनीतिक माध्यमों से सुलझाने का प्रयास जारी रखना चाहिए। शक्ति का इस्तेमाल अंतिम विकल्प होना चाहिए, क्योंकि किसी भी बड़े सैन्य संघर्ष की आर्थिक और मानवीय कीमत बहुत अधिक हो सकती है। चीन के साथ संबंधों में भी भारत को प्रतिस्पर्धा और सहयोग के बीच व्यावहारिक संतुलन बनाना होगा। सीमा विवाद का स्थायी समाधान आसान नहीं है, लेकिन सैन्य तनाव को नियंत्रित रखने के लिए राजनीतिक, कूटनीतिक और सैन्य स्तर पर संवाद के रास्ते खुले रखना रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है।
मजबूत सेना ही शांति की सबसे बड़ी गारंटी
कूटनीति को प्राथमिकता देने के बावजूद नरवणे सैन्य तैयारी में किसी तरह की ढिलाई के पक्ष में नहीं हैं। उनके विचार में भारत की सशस्त्र सेनाओं को हर समय संभावित परिस्थितियों से निपटने के लिए तैयार रहना चाहिए। सैन्य प्रतिरोध क्षमता का उद्देश्य युद्ध शुरू करना नहीं, बल्कि संभावित विरोधी को दुस्साहस से रोकना होता है। यदि किसी देश के पास पर्याप्त सैन्य क्षमता, आधुनिक हथियार, प्रभावी खुफिया तंत्र और तेज निर्णय लेने की क्षमता हो तो विरोधी के लिए आक्रामक कदम उठाना अधिक महंगा हो जाता है। नरवणे की यह सोच उस व्यापक रणनीतिक सिद्धांत से जुड़ती है जिसमें मजबूत प्रतिरोध क्षमता को शांति बनाए रखने का महत्वपूर्ण साधन माना जाता है।
2020 का लद्दाख संकट बना महत्वपूर्ण संदर्भ
नरवणे के वर्तमान सुरक्षा आकलन को उनके सेना प्रमुख के कार्यकाल से अलग करके नहीं देखा जा सकता। दिसंबर 2019 से अप्रैल 2022 तक थलसेना प्रमुख रहे नरवणे के कार्यकाल में 2020 का भारत-चीन सीमा संकट सबसे महत्वपूर्ण सैन्य चुनौतियों में रहा। पूर्वी लद्दाख में दोनों देशों की सेनाओं के बीच गंभीर तनाव के दौरान भारत ने ऊंचाई वाले क्षेत्रों में अपनी सैन्य तैनाती मजबूत की और वास्तविक नियंत्रण रेखा पर लंबी अवधि के लिए व्यापक सैन्य ढांचा तैयार किया। बाद में नरवणे की अप्रकाशित आत्मकथा से जुड़े अंशों ने भी 2020 के संकट के दौरान लिए गए सैन्य और राजनीतिक निर्णयों पर व्यापक बहस को जन्म दिया था। हालांकि उनकी हालिया रणनीतिक टिप्पणियों का केंद्र भविष्य की सुरक्षा चुनौतियों और भारत की तैयारी पर है।
भारत के लिए स्थिर पड़ोस क्यों जरूरी
नरवणे ने भारत की सुरक्षा को केवल सीमाओं तक सीमित न मानते हुए पड़ोसी देशों की स्थिरता को भी महत्वपूर्ण बताया है। नेपाल, भूटान, बांग्लादेश और म्यांमार जैसे पड़ोसी देशों में राजनीतिक अस्थिरता, हिंसा या आर्थिक संकट का असर भारत पर भी पड़ सकता है। किसी पड़ोसी देश में लंबे समय तक अस्थिरता रहने से अवैध हथियारों की आवाजाही, तस्करी, सीमा पार अपराध और शरणार्थी संकट जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं। भारत के लिए इसलिए यह जरूरी है कि वह अपने पड़ोसी देशों के साथ संवाद और सहयोग बनाए रखे तथा क्षेत्रीय स्थिरता में सकारात्मक भूमिका निभाए। भूगोल ऐसी वास्तविकता है जिसे कोई देश बदल नहीं सकता, इसलिए पड़ोस के साथ संबंधों को व्यावहारिक और दीर्घकालिक दृष्टिकोण से संभालना जरूरी है।
पड़ोसी देशों में अस्थिरता का सीधा असर भारत पर
भारत की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि उसके आसपास होने वाले राजनीतिक और सामाजिक बदलावों का प्रभाव देश की आंतरिक सुरक्षा पर पड़ सकता है। सीमा से लगे क्षेत्रों में यदि पड़ोसी देश में प्रशासनिक नियंत्रण कमजोर होता है तो अवैध गतिविधियों के लिए नए रास्ते खुल सकते हैं। मादक पदार्थों और हथियारों की तस्करी से लेकर अवैध आव्रजन तक कई चुनौतियां सीधे भारतीय सुरक्षा तंत्र पर दबाव डाल सकती हैं। इसलिए पड़ोसी देशों में शांति और स्थिरता को केवल विदेश नीति का विषय नहीं, बल्कि भारत की आंतरिक सुरक्षा और आर्थिक विकास का भी महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाना चाहिए। नरवणे का पड़ोसी स्थिरता पर जोर इसी व्यापक सुरक्षा दृष्टिकोण को रेखांकित करता है।
भारत को सैन्य आधुनिकीकरण पर भी देना होगा जोर
बदलती सुरक्षा चुनौतियों के बीच भारत के लिए केवल सैनिकों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। आधुनिक युद्ध तेजी से तकनीक आधारित होता जा रहा है, जिसमें ड्रोन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर क्षमता, अंतरिक्ष आधारित निगरानी, सटीक मारक क्षमता और स्वदेशी रक्षा उत्पादन की भूमिका लगातार बढ़ रही है। नरवणे स्वयं लंबे समय से सैन्य आधुनिकीकरण और बदलती सुरक्षा चुनौतियों पर सार्वजनिक रूप से विचार रखते रहे हैं। ऐसे में चीन जैसी बड़ी शक्ति के साथ दीर्घकालिक रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के लिए भारत को सैन्य क्षमता के साथ औद्योगिक और तकनीकी आधार भी मजबूत करना होगा। राष्ट्रीय सुरक्षा अब केवल सीमा पर तैनात सैनिकों की ताकत से तय नहीं होती, बल्कि अर्थव्यवस्था, प्रौद्योगिकी, आपूर्ति श्रृंखला और रक्षा उत्पादन भी उसकी महत्वपूर्ण आधारशिला बन चुके हैं।
प्रतिस्पर्धा के बीच संतुलित रणनीति की जरूरत
नरवणे के विचारों का व्यापक संदेश यही है कि भारत को किसी एक मोर्चे पर ध्यान केंद्रित करके दूसरे संभावित खतरे को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। पाकिस्तान से आतंकवाद की चुनौती तत्काल बनी रह सकती है, जबकि चीन के साथ प्रतिस्पर्धा दीर्घकालिक और व्यापक स्वरूप ले सकती है। इसलिए भारत को पश्चिमी और उत्तरी दोनों सीमाओं पर पर्याप्त सैन्य तैयारी के साथ-साथ मजबूत कूटनीतिक तंत्र विकसित करना होगा। इसके साथ ही पड़ोसी देशों में स्थिरता, आर्थिक शक्ति और तकनीकी आत्मनिर्भरता पर भी ध्यान देना होगा। यही संतुलित दृष्टिकोण भारत को संभावित संकटों से निपटने और बिना अनावश्यक टकराव के अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने में अधिक सक्षम बना सकता है।