कोलकाता: जादवपुर विश्वविद्यालय में GB मीटिंग को लेकर ABVP और वामपंथी छात्र संगठनों के बीच हुई हिंसक झड़प के बाद ABVP नेता और PhD शोधार्थी निखिल दास एक बार फिर विवादों में हैं। उनके खिलाफ 2014 के ‘होक कलरोब’ आंदोलन से जुड़े एक पुराने छेड़छाड़ मामले की जानकारी सोशल मीडिया पर सामने आने के बाद राजनीतिक और छात्र संगठनों के बीच आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गया है। बुधवार रात हुई झड़प में घायल निखिल दास को KPC मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में भर्ती कराया गया था।
2014 के मामले को लेकर फिर विवाद
अगस्त 2014 में जादवपुर विश्वविद्यालय के वार्षिक उत्सव के दौरान एक छात्रा के साथ कथित यौन उत्पीड़न की घटना के विरोध में छात्रों ने ‘होक कलरोब’ आंदोलन शुरू किया था। इसी मामले की पुलिस जांच के दौरान निखिल दास और एक अन्य B.Tech छात्र का नाम सामने आया था। अब, करीब एक दशक बाद, पुराना मामला सोशल मीडिया पर दोबारा चर्चा में आने से विवाद ने नया रूप ले लिया है।
निखिल दास का दावा—2018 में मिल चुकी है क्लीन चिट
निखिल दास ने पुराने आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि पुलिस जांच के बाद 2018 में उन्हें क्लीन चिट मिल चुकी थी। उनका दावा है कि इसके बाद ही उन्होंने जादवपुर विश्वविद्यालय में अपनी M.Tech और PhD की पढ़ाई जारी रखी। उन्होंने आरोप लगाया कि मौजूदा राजनीतिक विवाद के बीच उनकी पुरानी छवि को लेकर भ्रामक जानकारी फैलाई जा रही है। निखिल दास ने कहा कि उनके खिलाफ झूठी या मानहानिकारक सामग्री प्रसारित करने वालों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
ABVP ने निष्पक्ष जांच की मांग की
जादवपुर विश्वविद्यालय में हालिया हिंसा को लेकर ABVP ने भी अपना पक्ष रखा है। संगठन ने हिंसा और तोड़फोड़ में बाहरी तत्वों की कथित भूमिका से किसी भी संबंध से इनकार किया है। ABVP का कहना है कि विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थान में हिंसा, धमकी और डर का माहौल स्वीकार्य नहीं है। संगठन ने पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष और समयबद्ध पुलिस जांच की मांग करते हुए वास्तविक दोषियों की पहचान कर उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।
पुराने मामले और मौजूदा हिंसा को लेकर बढ़ी राजनीतिक गर्मी
जादवपुर विश्वविद्यालय में हालिया टकराव के बाद छात्र राजनीति एक बार फिर केंद्र में आ गई है। एक ओर GB मीटिंग की वैधता और हिंसा को लेकर दोनों पक्ष एक-दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर निखिल दास से जुड़ा पुराना मामला सोशल मीडिया और राजनीतिक बहस का हिस्सा बन गया है। हालांकि, 2014 के मामले में निखिल दास की ओर से 2018 में क्लीन चिट मिलने का दावा सामने आया है, ऐसे दावों की स्वतंत्र कानूनी पुष्टि अलग विषय है। मौजूदा विवाद में पुलिस जांच और उपलब्ध दस्तावेज ही आगे की स्थिति स्पष्ट कर सकते हैं।