मुंबई - मिलावटखोरों के खिलाफ सख्त कार्रवाई को लेकर चर्चा में आए IAS अधिकारी तुकाराम मुंढे ने सिविल सेवा की भूमिका और जवाबदेही को लेकर अपनी बात रखी है। बिजनेस टुडे के ‘इंडिया एट 100’ कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि किसी भी व्यवस्था में संस्थाएं व्यक्तियों से ज्यादा महत्वपूर्ण होती हैं। उनके मुताबिक, एक सिविल सर्वेंट की असली पहचान उसके पद या लोकप्रियता से नहीं, बल्कि जनता के प्रति जवाबदेही और संवैधानिक मूल्यों के प्रति उसकी प्रतिबद्धता से होती है।
‘बाबू’ कहलाना पसंद नहीं
भारतीय नौकरशाही को अक्सर ‘बाबूशाही’ और लालफीताशाही जैसी छवि से जोड़कर देखा जाता है। तुकाराम मुंढे इस सोच को बदलने की जरूरत बताते हैं। उन्होंने कहा कि वह खुद को केवल ‘बाबू’ या ‘ब्यूरोक्रेट’ कहलाना पसंद नहीं करते। उनके लिए वह एक सिविल सर्वेंट और पब्लिक सर्वेंट हैं, जिसकी पहली जिम्मेदारी जनता और संविधान के प्रति है।
पद नहीं, काम से हो पहचान
तुकाराम मुंढे के मुताबिक, किसी अधिकारी की पहचान उसके पद, प्रभाव या व्यक्तिगत लोकप्रियता से नहीं होनी चाहिए। असली पहचान उसके काम और संवैधानिक जिम्मेदारियों को निभाने के तरीके से होती है। उन्होंने कहा कि सरकारी अधिकारी का उद्देश्य व्यवस्था को बेहतर बनाना और आम लोगों के हित में काम करना होना चाहिए।
‘ब्यूरोक्रेट’ शब्द गलत नहीं, सोच बदलने की जरूरत
तुकाराम ने स्पष्ट किया कि ‘ब्यूरोक्रेट’ या ‘बाबू’ शब्द अपने आप में गलत या अपमानजनक नहीं है। समस्या उस पारंपरिक धारणा से है, जिसमें नौकरशाही को आत्मसंतुष्ट, निष्क्रिय और बदलाव से दूर समझा जाता है। उनका मानना है कि अब इस सोच को बदलने का समय आ गया है। यह बदलाव किसी एक अधिकारी की व्यक्तिगत कोशिश से नहीं होगा, बल्कि पूरी सिविल सेवा को जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारी और जवाबदेही को प्राथमिकता देनी होगी।
मिलावट के खिलाफ मुहिम से चर्चा में
तुकाराम मुंढे इन दिनों मिलावटखोरों के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान को लेकर भी चर्चा में हैं। उनकी कार्यशैली और सख्त रवैये को लेकर सोशल मीडिया पर भी खूब चर्चा होती रही है। उनका कहना है कि प्रशासन का काम केवल नियम-कायदे लागू करना नहीं, बल्कि लोगों के जीवन और अधिकारों की रक्षा करना भी है। उनका यह नजरिया सिविल सेवा में जवाबदेही, पारदर्शिता और संवैधानिक मूल्यों को प्राथमिकता देने की जरूरत पर जोर देता है।