कोलकाता: शिक्षा, समान अवसर और भारतीय शिक्षा परंपरा को लेकर भाजपा नेता समिक भट्टाचार्य ने आज एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कई महत्वपूर्ण बातें कहीं। उन्होंने शिक्षकों के योगदान की सराहना करते हुए कहा कि विद्यार्थियों के भीतर शिक्षा और ज्ञान के प्रति रुचि पैदा करने में शिक्षकों की अहम भूमिका है। उन्होंने कहा कि समाज में कर्तव्य के साथ-साथ हर व्यक्ति को अपने अधिकारों के प्रति भी जागरूक होना चाहिए। समिक भट्टाचार्य ने महिला शिक्षा, स्वामी विवेकानंद के विचारों, नई शिक्षा नीति और ईश्वरचंद्र विद्यासागर के योगदान का भी उल्लेख किया।
शिक्षकों के योगदान को किया नमन
समिक भट्टाचार्य ने कहा कि शिक्षकों का काम केवल बच्चों को किताबों तक सीमित ज्ञान देना नहीं है, बल्कि उनके भीतर सीखने की इच्छा और जिज्ञासा पैदा करना भी है। उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में काम कर रहे शिक्षकों को नमन करते हुए कहा कि किशोरों में ज्ञान और शिक्षा के प्रति रुचि पैदा करने के लिए लगातार प्रयास जरूरी है। उन्होंने कहा कि विद्यार्थियों के साथ खड़ा होने और उनके हितों की रक्षा करने की कोशिश की जा रही है। उनके मुताबिक, शिक्षा समाज के निर्माण का सबसे मजबूत आधार है।
कर्तव्य के साथ अधिकारों की भी समझ जरूरी
समिक भट्टाचार्य ने भारतीय समाज और दुनिया के बीच अधिकार तथा कर्तव्य की सोच को लेकर अंतर का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि दुनिया के कई हिस्सों में अधिकारों की बात प्रमुखता से की जाती है, जबकि भारतीय समाज में कर्तव्य को अधिक महत्व दिया जाता है। उन्होंने कहा कि शिक्षक जब अपना कर्तव्य निभाते हैं तो विद्यार्थियों के अधिकारों की रक्षा भी होती है। उनके अनुसार, विद्यार्थियों को भी अपने अधिकारों के साथ अपनी जिम्मेदारियों को समझना चाहिए। शिक्षा व्यवस्था में दोनों के बीच संतुलन जरूरी है।
महिला शिक्षा को लेकर रखी बात
समिक भट्टाचार्य ने महिला शिक्षा के इतिहास का जिक्र करते हुए कहा कि एक दौर ऐसा भी था जब महिलाओं को शिक्षा से दूर रखने की कोशिश की गई। उन्होंने ब्रिटिश शासन के दौरान महिलाओं की शिक्षा को लेकर बनाए गए कथित सामाजिक दृष्टिकोण का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में महिलाओं की शिक्षा का इतिहास इससे कहीं पुराना है। प्राचीन गुरुकुल व्यवस्था का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि कन्याओं को भी शिक्षा प्राप्त करने के अवसर मिलते थे। उनके मुताबिक, शिक्षा किसी एक वर्ग या लिंग तक सीमित नहीं होनी चाहिए।
शिक्षा पर हर व्यक्ति का अधिकार
उन्होंने स्वामी विवेकानंद के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि समाज के हर व्यक्ति को धन, शिक्षा और ज्ञान प्राप्त करने के समान अवसर मिलने चाहिए। समिक भट्टाचार्य ने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा पास करना या रोजगार हासिल करना नहीं होना चाहिए। इसके जरिए व्यक्ति में स्वतंत्र सोच और निर्णय लेने की क्षमता विकसित होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि शिक्षा व्यक्ति को अपने पैरों पर खड़ा होने और समाज में योगदान देने के लिए सक्षम बनाती है। इसलिए शिक्षा तक समान पहुंच बेहद जरूरी है।
नई शिक्षा नीति का किया जिक्र
समिक भट्टाचार्य ने नई शिक्षा नीति का उल्लेख करते हुए कहा कि विद्यार्थियों को अपनी रुचि और क्षमता के अनुसार आगे बढ़ने का अवसर मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि जिस विषय में किसी विद्यार्थी की रुचि और लगाव है, उसे उसी दिशा में आगे बढ़ने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। शिक्षा को केवल भारी स्कूल बैग और किताबों के बोझ तक सीमित रखना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि ऐसी शिक्षा व्यवस्था की जरूरत है जो बच्चों के भीतर रचनात्मकता, जिज्ञासा और स्वतंत्र सोच विकसित करे।
रवींद्रनाथ ठाकुर की शिक्षा पद्धति का किया उल्लेख
समिक भट्टाचार्य ने कविगुरु रवींद्रनाथ ठाकुर की शिक्षा पद्धति का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि ठाकुर ने आश्रमिक शिक्षा व्यवस्था के जरिए शिक्षा को प्रकृति, अनुभव और स्वतंत्र सोच से जोड़ने की कोशिश की थी। उनके अनुसार, शिक्षा का उद्देश्य केवल पाठ्यक्रम पूरा करना नहीं बल्कि विद्यार्थी के व्यक्तित्व का समग्र विकास करना होना चाहिए। उन्होंने कहा कि आज भी भारत और विदेशों में शिक्षा व्यवस्था और पाठ्यक्रम को नए तरीके से आगे बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं। इसमें भारतीय शिक्षा परंपरा के मूल विचारों से प्रेरणा ली जा सकती है।
विद्यासागर को बताया अद्वितीय व्यक्तित्व
समिक भट्टाचार्य ने ईश्वरचंद्र विद्यासागर के योगदान को याद करते हुए उन्हें बंगाल की महान विभूतियों में से एक बताया। उन्होंने कहा कि विद्यासागर ने स्वयं को शिक्षक और पुस्तक विक्रेता के रूप में पहचाना। उन्होंने शिक्षा और समाज सुधार के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। समिक भट्टाचार्य ने एक चिकित्सक डॉ. प्रणब कुमार राय का भी उल्लेख किया, जिन्हें उन्होंने जीवनियों और आत्मकथाओं का गहरा अध्येता बताया। उनके अनुसार, डॉ. राय के पास हजारों किताबें थीं और उन्हें अलग-अलग भाषाओं में लिखी जीवनियां पढ़ने में विशेष रुचि थी।
विद्यासागर की जीवनी को बताया खास
समिक भट्टाचार्य ने बताया कि जब उन्होंने डॉ. प्रणब कुमार राय से पूछा कि उन्हें कौन-सी जीवनी सबसे अधिक पसंद है, तो उन्होंने ईश्वरचंद्र विद्यासागर का नाम लिया। उन्होंने कहा कि डॉ. राय के अनुसार विद्यासागर का जीवन और व्यक्तित्व इतना अलग था कि उनके जैसी जीवनी का कोई दूसरा उदाहरण मिलना मुश्किल है। समिक भट्टाचार्य ने लेखक अमलेश मिश्रा की विद्यासागर पर लिखी पुस्तक का भी उल्लेख किया। उन्होंने लोगों से विद्यासागर के जीवन और विचारों को समझने के लिए ऐसी पुस्तकों को पढ़ने की अपील की।
शिक्षा से बनेगा स्वतंत्र सोच वाला समाज
समिक भट्टाचार्य ने कहा कि शिक्षा का अंतिम उद्देश्य केवल डिग्री हासिल करना नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र और जिम्मेदार व्यक्तित्व का निर्माण करना होना चाहिए। उन्होंने कहा कि विद्यार्थियों को अपनी रुचि, प्रतिभा और विचारों के आधार पर आगे बढ़ने का अवसर मिलना चाहिए। उनके मुताबिक, भारतीय शिक्षा परंपरा में ज्ञान को जीवन से जोड़कर देखने की सोच रही है। इसी भावना के साथ आधुनिक शिक्षा व्यवस्था को भी आगे बढ़ाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि शिक्षा के जरिए ही एक जागरूक और सक्षम समाज का निर्माण संभव है।